भारतीय टीम के इस कप्तान ने टीम को सिखाई दादागिरी | Saurav Ganguly Biography in Hindi

Saurav Ganguly Biography in Hindi: दोस्तों भारतीय क्रिकेट टीम इस समय दुनिया की सबसे मजबूत टीमों में से एक है।

लेकिन एक समय ऐसा भी था जब यही भारतीय टीम Test Ranking में आठवें नंबर तक पिछड़ चुकी थी और इसके पीछे की जो मुख्य वजह थी वह यह कि मोहम्मद अजहरुद्दीन जोकि भारतीय क्रिकेट कप्तान थे उनका Match Fixing में फँस जाना और उनके बाद भारतीय टीम की कमान सौंपी गई सौरव गांगुली को।

 

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अपनी मेहनत लगन और कुशलता के दम पर दादा ने भारतीय टीम को आठवें नंबर से दूसरे नंबर पर पहुंचा दिया और जो टीम पहले ड्रा करने के लिए खेलती थी आज वह जीतने के नजरिए से मैदान में उतरने लगी।

और ना सिर्फ Test Match में ही बल्कि ODI में भी सौरभ गांगुली के नेतृत्व में भारतीय टीम ने सन 2003 में फाइनल तक का रास्ता तय किया था और अभी हाल ही में सौरभ गांगुली का नाम इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि उन्हें BCCI President के तौर पर चुना गया है।

अपना पदभार संभालने के अलावा सौरभ गांगुली ने कई सारे बड़े फैसले भी लेने शुरू कर दिए हैं जैसे कि उन्होंने बांग्लादेश के क्रिकेट बोर्ड के साथ Day-Night Match खेलने का भी deal कर लिया और इस तरह उन्होंने टेस्ट मैच की लोकप्रियता को बचाने के लिए जरूरी कदम भी उठाया है।

हालांकि दोस्तों आज के इस Article में हम जानेंगे- दादा, प्रिंस ऑफ कोलकाता, बंगाल टाइगर, महाराजा और गॉड ऑफ द साइड जैसे कई सारे नामों से पहचाने जाने वाले सौरभ गांगुली की पूरी कहानी कि किस तरह भारतीय टीम के इस कप्तान ने टीम को सिखाई दादागिरी।

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Saurav Ganguly Biography in Hindi:

तो दोस्तों इस कहानी की शुरुआत होती है 8 जुलाई 1972 से जब कोलकाता में सौरव गांगुली का जन्म हुआ था उनके पिता का नाम चंडीदास गांगुली है और मां का नाम निरुमा गांगुली है।

दोस्तों वैसे तो सौरव गांगुली को आर्थिक समस्या से कभी भी नहीं जूझना पड़ा क्योंकि सौरभ के पिता अपने समय में शहर के सबसे अमीर लोगों में से एक हुआ करते थे और उनका Florentine Printing से जुड़ा करोबार था।

इसके अलावा सौरभ की Family में उनका एक भाई भी है जिसका नाम स्नेहाशीष गांगुली है और वह भी बंगाल क्रिकेट टीम में एक जाने-माने खिलाड़ी रह चुके हैं हालांकि नेशनल टीम में खेलने का उन्हें कभी भी मौका नहीं मिल सका।

वैसे बचपन में अगर देखा जाए तो अपने भाई को देख कर ही सौरभ के दिल में क्रिकेट की दिलचस्पी पैदा हुई लेकिन समस्या यह थी कि उनकी मां नहीं चाहती थी कि उनके बच्चे किसी भी तरह के Sports में आगे बढ़े।

क्योंकि उन्हें पता था कि National Level पर खेलना इतना आसान काम नहीं होता है हालांकि बच्चे तो बच्चे ही होते हैं सौरभ क्रिकेट में लगातार अच्छा प्रदर्शन करते रहे और फिर उनके भाई ने उनका मनोबल बढ़ाना भी शुरू कर दिया।

वैसे तो दोस्तों गांगुली शुरुआत में Right Hand Batsman थे लेकिन अपने भाई के Sport Gadgets use करने के लिए वे Left Hand से Batting करने लगे और यहीं से Left Hand Batting की उनकी आदत पड़ गई।

फिर आगे चलकर जब घर वालों ने भी गांगुली के शानदार खेल को समझ लिया तब वह भी उनका साथ देने लगे और दसवीं क्लास के दौरान Cricket Camp में उन्हें Admission दिलवा दिया साथ ही बेहतर Practice के लिए गांगुली के पिता ने Indoor Gym और Concrete Vicket तैयार करवा दिया।

फिर यहां पर भी गांगुली बहुत सारी क्रिकेट मैच के Videos देखकर खुद को बेहतर बनाने में लगे हुए थे और फिर Odisha Under15 में शतक लगाने के बाद से गांगुली को St. Xavier School के क्रिकेट मैच का कप्तान बना दिया गया।

 

फिर यहीं से सौरव गांगुली को बहुत कम उम्र में ही कप्तानी की बारीकियों को सीखने का मौका मिला और फिर लगातार बेहतर प्रदर्शन करने के बाद 1989 में गांगुली ने बंगाल टीम की तरफ से अपना 1st Class Debut भी किया।

 

फिर घरेलू टीम के साथ रणजी में भी शानदार प्रदर्शन देने के बाद से उनका नाम भारत की National Team के लिए भी लिया जाने लगा और फिर इस तरह से 11 जनवरी 1992 को वेस्टइंडीज के खिलाफ उन्होंने अपना ODI Debut किया।

हालांकि अपने डेब्यू मैच में उन्होंने सिर्फ 3 रन बनाए फिर इसके बाद से उन्हें टीम से बाहर का रास्ता दिखा दिया गया हार ना मानते हुए उन्होंने घरेलू मैचों में शानदार प्रदर्शन कर सभी का दिल जीता और फिर सन 1993, 1994 और 1995 में रणजी मैचों में रनों का अंबार लगाने के बाद से नेशनल टीम में इस बार उनकी मजबूती से वापसी हुई।

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Lord’s Cricket Ground में 20 जून 1996 को सौरभ गांगुली को Test Match में भी Debut करने का मौका मिल गया और अपने डेब्यू मैच में ही उन्होंने England के खिलाफ शानदार शतक जड़ा और फिर इसी मैच के दूसरे टूर्नामेंट में भी जब वह मैदान पर उतरे तो फिर वहां पर भी शतक लगाकर उन्होंने यह संदेश सभी को दे दिया कि क्रिकेट के खेल में बंगाल टाइगर भी आ चुका है।

 

और फिर इसी बीच England का Tour खत्म होने के बाद से Dona Roy से गांगुली ने शादी करली।

दोस्तों वैसे तो दोनों परिवारों के बीच बिल्कुल भी नहीं बनती थी लेकिन आगे चलकर सब कुछ सही हो गया और फिर जब साल 2000 में भारतीय टीम के कुछ खिलाड़ियों का नाम Match Fixing में आया तब गांगुली को टीम की कप्तानी सौंप दी गई।

 

हालांकि यह दौर भारतीय टीम के नजरिए से बहुत ही बुरा गुजर रहा था लेकिन अपनी शानदार कप्तानी में दादा ने टीम को एकजुट किया और हर मैच में ही जीत के मकसद से मैदान में उतरने लगे।

 

दोस्तों 2002 में Lord’s Cricket Ground पर जब Indian Team ने NatWest Series में England को हराया था तब गांगुली ने Lord’s की बालकनी में अपना Jersey उतार दिया और यह Moment खेल प्रेमियों के लिए आज भी Golden Moment है।

 

इसके अलावा साल 2003 में भी सौरभ गांगुली ने टीम को फाइनल में पहुंचाने के लिए अहम भूमिका निभाई और इस तरह शेरों की तरह वह कई साल तक आगे भी खेलते रहे और फिर आखिरकार 2008 में उन्होंने क्रिकेट टीम से संन्यास लेने का फैसला कर लिया।

 

हालांकि अब तक भारत के सबसे महान कप्तान और खिलाड़ियों में गिनती करवा चुके थे और फिर एक खिलाड़ी के तौर पर भी Retirement लेने के बाद से वह क्रिकेट से जुड़े रहे।

 

जहां उन्होंने बंगाल क्रिकेट प्रेसिडेंट के तौर पर बंगाल के क्रिकेट को बेहतर बनाने में अहम भूमिका निभाई और अब 2019 में उन्हें BCCI President का पद भी दिया जा चुका है और यहां भी हम यही उम्मीद करते हैं कि सौरभ गांगुली अपने हुनर को सही इस्तेमाल करते हुए भारतीय टीम को और भी बुलंदियों पर ले जाएंगे।

दोस्तों उम्मीद करते हैं आपको सौरव गांगुली की यह कहानी बेहद पसंद आई होगी।

आपका हमारे इस ब्लॉग पर कीमती समय देने के लिए धन्यवाद !

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